Sunday, July 21, 2019

बग्वाल मेला - मां बाराही देवी धाम देवीधुरा में होने वाला पाषाण युद्ध (पत्थर मरने वाली लड़ाई ) के बारे में जाने


बग्वाल मेला - मां बाराही देवी धाम देवीधुरा में होने वाला पाषाण युद्ध (बग्वाल महोत्सव )









बग्वाल मेला  - मां बाराही देवी धाम देवीधुरा में होने वाला पाषाण युद्ध | देवीधुरा का प्रसिद्ध बाराही मंदिर उत्तराखंड के चंपावत जनपद में स्थित है | बाराही देवी मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष रक्षाबंधन के अवसर पर श्रावणी पूर्णिमा को पाषाण युद्ध बग्वाल मेला होता है|  जिसे पत्थरों द्वारा चार पक्षों के परस्पर युद्ध खेला जाता है  इसे बग्वाल  कहते हैं| इस पाषाण कालीन  युद्ध में योद्धा अपने  साथ ढाले लेकर आते हैं| जिसे युद्ध के दौरान अपनी रक्षा के लिए  इस्तेमाल किया जाता है|


 पाषाण युद्ध (बग्वाल मेला) गहड़वाल खाम,  चमियाला खाम, वालिक खाम और लमगढ़िया खाम के बीच किया जाता है| श्रावण मास की पूर्णिमा को  लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करने वाला पौराणिक धार्मिक ऐतिहासिक स्थल देवीधुरा मां बाराही धाम अपने इस पाषाण युद्ध के लिए पूरे भारत सहित पुरे दुनिया में प्रसिद्ध है|

श्रावण मास की पूर्णिमा  के दिन पूरे भारतवर्ष में रक्षाबंधन का त्यौहार पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है| इस दिन योद्धाओं की बहनें अपने भाइयों को बग्वाल  के लिए तैयार करती हैं युद्ध में प्रयोग होने  वाले ढाल  को सजा कर विदा किया जाता है




 मां बाराही देवीधुरा धाम में प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा के अनुसार 12वीं धाम में रक्षाबंधन के दिन यहां के स्थानीय लोग चार दलों में विभाजित होकर जिन्हें खाम जाता है|   क्रमशः गहड़वाल खाम,  चमियाला खाम, वालिक खाम और लमगढ़िया खाम  दो समूह में बढ़ जाते हैं|और इसके बाद होता है युद्ध (बग्वाल )जो पत्थरों को अस्त्र के रूप में प्रयोग किया जाता है  




 इस पाषाण कालीन युद्ध को कुमाऊनी भाषा मे बग्वाल कहा जाता है | यह को बग्वाल कुमाऊं की संस्कृति का अभिन्न अंग है| श्रावण मास में पूरे महीने यहां मेला लगता है|  जहां सबके लिए यह दिन रक्षाबंधन का दिन होता है वही कुमाऊं और देवीधुरा के लिए यह दिन पत्थर युद्ध  बग्वाल के रूप में जाना जाता है| धार्मिक आस्था के साथ साथ जो स्थान हिमालय के अद्भुत दृश्य के लिए भी जाना जाता है जो भक्तों को एक अलग ही आनंद देता है|देवीधुरा में सिद्धि भी मां बाराही के मंदिर के परिसर के आसपास अन्य स्थलों में खुली कार्ड दुर्गा चौक खोलीगाड़  दुर्वाचोड़ गुफा के अंदर  बाराही शक्तिपीठ का दर्शन परिसर में ही स्थित संस्कृत महाविद्यालय परिसर शंखचक्र, घंटाघर, गुफा, भीमशिला आदि प्रमुख हैं|




देवीधुरा में बसने वाली मां बाराही का मंदिर 52 पीठों में से एक माना जाता है| मुख्य मंदिर में तांबे की पेटी में मां बाराही देवी की मूर्ति है| इस बाराही देवी की मूर्ति को अभी तक किसी ने नहीं देखा है| हर साल भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा को बागड़ जाति के क्षत्रिय वंशज द्वारा ताम्र पेटी का को मुख्य मंदिर से नंद गांव में लाया जाता है| जहां आंखों में पट्टी बात कर मां बाराही को स्नान करा कर सिंगार किया जाता है|





पूजा अर्चना के बाद मां बाराही की मूर्ति को गोद में रखकर मंदिर के प्रांगण में परिक्रमा की जाती है| और सभी भक्तों पर मां का आशीर्वाद लेकर सुख की प्राप्ति करते हैं|  जय मां बाराही जय मां भगवती

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Wednesday, July 17, 2019

जानिए हरेले पर्व में दिए जाने वाले आशीर्वाद का क्या अर्थ है? जानिए




हरेले पर्व में दिए जाने वाले आशीर्वाद 

हरेला देवभूमि उत्तराखंड का एक प्रमुख त्यौहार है। श्रावण शुरू होने से नौ या दस दिन पहले घरों में जो हरेला बोया जाता है,

जब सूर्य मिथुन राशि से कर्क राशि में प्रवेश करता है,तो उसे कर्क संक्रांति कहते हैं। इस दिन प्रातःकाल से ही पूरे परिवार के लोग हरेला पर्व की तैयारी में लग जाते हैं।बड़े और बुजुर्ग लोग अपने से छोटे लोगों को आशीर्वाद देते हुए हरेला लगाते हैं। इस मौके पर माताएं और बुजुर्ग महिलाएं  परिवारजनों को दीर्घायु,बुद्धिमान और शक्तिमान होने की शुभकामनाएं देती हैं और अपने पुत्र-पौत्रों को संघर्षपूर्ण जीवन-रण में ‘विजयी भव’ होने का आशीर्वाद देते हुए स्थानीय भाषा में कहती हैं-


“जी रये, जागि रये, तिष्टिये,पनपिये,
दुब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस फइये,।
हिमाल में ह्यूं छन तक, 
गंगज्यू में पांणि छन तक,
यो दिन और यो मास भेटनैं रये, 
अगासाक चार उकाव,धरती चार चकाव है जये,
स्याव कस बुद्धि हो, स्यू जस पराण हो।”

जी रये, जागि रये, तिष्टिये,पनपिये, - “हरेला तुम्हारे लिए शुभ होवे, तुम जीवन पथ पर विजयी बनो, जागृत बने रहो, समृद्ध बनो, तरक्की करो|
दुब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस फइये -दूब घास की तरह तुम्हारी जड़ सदा हरी रहे, बेर के पेड़ की तरह तुम्हारा परिवार फूले और फले।
हिमाल में ह्यूं छन तक,- जब तक कि हिमालय में बर्फ है,
गंगज्यू में पांणि छन तक - गंगा में पानी है,
यो दिन और यो मास भेटनैं रये- तब तक ये शुभ दिन, मास तुम्हारे जीवन में आते रहें।
अगासाक चार उकाव - आकाश की तरह ऊंचे हो जाओ, 
धरती चार चकाव है जये - धरती की तरह चौड़े बन जाओ,
स्याव कस बुद्धि हो - सियार की सी तुम्हारी बुद्धि होवे, 
स्यू जस पराण हो - शेर की तरह तुम में प्राणशक्ति हो” 

 ये ही वे आशीर्वचन और दुआएं हैं जो हरेले के अवसर पर घर के बड़े बूढ़े व बजुर्ग महिलाएं बच्चों, युवाओं और बेटियों के सिर में हरेले की पीली पत्तियों को रखते हुए देती हैं।


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लोकपर्व हरेला देवभूमि उत्तराखंड का एक प्रमुख त्यौहार है। श्रावण शुरू होने से नौ या दस दिन पहले घरों में जो हरेला बोया जाता है,उसे श्रावण मास की कर्क संक्रांति को काटा जाता है।भारतीय पंचांग के अनुसार,जब सूर्य मिथुन राशि से कर्क राशि में प्रवेश करता है,तो उसे कर्क संक्रांति कहते हैं। 

इस दिन प्रातःकाल से ही पूरे परिवार के लोग हरेला पर्व की तैयारी में लग जाते हैं।बड़े और बुजुर्ग लोग अपने से छोटे लोगों को आशीर्वाद देते हुए हरेला लगाते हैं। इस मौके पर माताएं और बुजुर्ग महिलाएं  परिवारजनों को दीर्घायु,बुद्धिमान और शक्तिमान होने की शुभकामनाएं देती हैं और अपने पुत्र-पौत्रों को संघर्षपूर्ण जीवन-रण में ‘विजयी भव’ होने का आशीर्वाद देते हुए स्थानीय भाषा में कहती हैं-

“जी रये, जागि रये, तिष्टिये,पनपिये,
दुब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस फइये,।
हिमाल में ह्यूं छन तक, 
गंगज्यू में पांणि छन तक,
यो दिन और यो मास भेटनैं रये, 
अगासाक चार उकाव,धरती चार चकाव है जये,
स्याव कस बुद्धि हो, स्यू जस पराण हो।”

जी रये, जागि रये, तिष्टिये,पनपिये, - “हरेला तुम्हारे लिए शुभ होवे, तुम जीवन पथ पर विजयी बनो, जागृत बने रहो, समृद्ध बनो, तरक्की करो|
दुब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस फइये -दूब घास की तरह तुम्हारी जड़ सदा हरी रहे, बेर के पेड़ की तरह तुम्हारा परिवार फूले और फले।
हिमाल में ह्यूं छन तक,- जब तक कि हिमालय में बर्फ है,
गंगज्यू में पांणि छन तक - गंगा में पानी है,
यो दिन और यो मास भेटनैं रये- तब तक ये शुभ दिन, मास तुम्हारे जीवन में आते रहें।
अगासाक चार उकाव - आकाश की तरह ऊंचे हो जाओ, 
धरती चार चकाव है जये - धरती की तरह चौड़े बन जाओ,
स्याव कस बुद्धि हो - सियार की सी तुम्हारी बुद्धि होवे, 
स्यू जस पराण हो - शेर की तरह तुम में प्राणशक्ति हो” 

 ये ही वे आशीर्वचन और दुआएं हैं जो हरेले के अवसर पर घर के बड़े बूढ़े व बजुर्ग महिलाएं बच्चों, युवाओं और बेटियों के सिर में हरेले की पीली पत्तियों को रखते हुए देती हैं। दूर प्रवास में रहने वाले परिजनों को भी वर्ष भर हरेले की इन पीली पत्तियों का इन्तजार रहता है कि कब चिट्ठी आए और कब वे हरेले की इन पत्तियों के रूप में अपने बुजुर्गों का शुभ आशीर्वाद शिरोधार्य कर सकें।


हरेला पर्व उत्तराखंड का एक प्रमुख सांस्कृतिक त्योहार होने के साथ साथ यहां की परंपरागत कृषि से जुड़ा सामाजिक और कृषि वैज्ञानिक महोत्सव भी है। उत्तम खेती, हरियाली, धनधान्य, सुख -संपन्नता आदि से इस त्यौहार का घनिष्ठ सम्बंध रहा है। माना जाता है कि जिस घर में हरेले के पौधे जितने बड़े होते हैं, उसके खेतों में उस वर्ष उतनी ही अच्छी फसल होती है। हरेला उगाने के लिए पांच अथवा सात अनाज गेहूं, जौ, मक्का, सरसों, गौहत, कौंड़ी, धान और भट्ट आदि के बीज घर के भीतर छोटी टोकरियों अथवा लकड़ी के बक्सों में बोये जाते हैं, और प्रतिदिन नियमानुसार सुबह-शाम पूजा के बाद पानी दिया जाता है। 

धूप की रोशनी न मिलने के कारण ये अनाज के पौधे पीले हो जाते हैं।10वें दिन संक्रान्ति को हरेला काटा जाता है। घर के मन्दिरों और गृह द्वारों में सबसे पहले हरेला चढ़ाया जाता है और फिर घर के बड़े बूढ़े बुजुर्ग लोग बच्चों, युवाओं, पुत्र, पुत्रियों, नाती, पोतों के पांवों से छुआते हुए ऊपर की ओर शरीर पर स्पर्श कराते हुए हरेले की पत्तियों को शिर में चढ़ाते हैं तथा “जी रये, जागि रये, तिष्टिये, पनपिये” बोलते हुए आशीर्वाद देते हैं। 

‘हरेला’ महोत्सव मात्र एक संक्राति नहीं बल्कि कृषि तथा वानिकी को प्रोत्साहित करने वाली हरित क्रान्ति का निरन्तर रूप से चलने वाला वार्षिक अभियान भी है जिस पर हमारी जीवनचर्या टिकी हुई है तथा उत्तराखंड राज्य की हरियाली और खुशहाली भी।इसलिए हरित क्रान्ति के इस अभियान पर विराम नहीं लगना चाहिए। हरेले पर्व का मातृ-प्रसाद हमें साल में एक बार संक्राति के दिन मिलता है परन्तु धरती माता की हरियाली पूरे साल भर चाहिए।यही कारण है कि उत्तराखंड कृषि प्रधान प्रदेश होने के कारण हमारे पूर्वजों ने साल में तीन बार हरेला बोने और काटने की परंपरा का सूत्रपात किया और सबसे पहले धान की खेती के आविष्कार का श्रेय भी इन्हीं उत्तराखंड के आर्य किसानों को मिला। हरेला उत्तराखंड के आर्य किसानों का पहाड़ी और पथरीली धरती में हरित क्रान्ति लाने की नव ऊर्जा भरने का लोकपर्व भी है। 

किसी जमाने में हरेला पर्व से ही आगामी साल भर के कृषि कार्यों का शुभारम्भ धरती पर हुआ करता था। सावन-भादो के पूरे दो महीने हमें प्रकृति माता ने इसलिए दिए हैं ताकि बंजर भूमि को भी उपजाऊ बना सकें, उसे शाक-सब्जी उगा कर हरा भरा रख सकें। धान की रोपाई और गोड़ाई के द्वारा इन बरसात के महीनों का सदुपयोग किया सकता है। समस्त उत्तराखंड आज जल संकट और पलायन की विभीषिका को झेल रहा है उसका कारण यह है कि परंपरागत खाल,तालाब आदि जलभंडारण के स्रोत सूख गए हैं उन्हें भी इन्हीं बरसात के मौसम में पुनर्जीवित किया जा सकता है।

आइए ! हरेले त्यौहार के इस पावन अवसर पर उत्तराखंड में हरित क्रांति के संदेश को जन जन तक पहुंचाएं और देवभूमि उत्तराखंड को खुशहाल और उपजाऊ बनाने में अपना योगदान दें। हरेले त्यौहार के इस पावन पर्व पर सभी देशवासियों और उत्तराखण्डवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं।

“जी रया, जागि रया, तिष्टिया,पनपिया ” !!


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