हरेले पर्व में दिए जाने वाले आशीर्वाद
हरेला देवभूमि उत्तराखंड का एक प्रमुख त्यौहार है। श्रावण शुरू होने से नौ या दस दिन पहले घरों में जो हरेला बोया जाता है,जब सूर्य मिथुन राशि से कर्क राशि में प्रवेश करता है,तो उसे कर्क संक्रांति कहते हैं। इस दिन प्रातःकाल से ही पूरे परिवार के लोग हरेला पर्व की तैयारी में लग जाते हैं।बड़े और बुजुर्ग लोग अपने से छोटे लोगों को आशीर्वाद देते हुए हरेला लगाते हैं। इस मौके पर माताएं और बुजुर्ग महिलाएं परिवारजनों को दीर्घायु,बुद्धिमान और शक्तिमान होने की शुभकामनाएं देती हैं और अपने पुत्र-पौत्रों को संघर्षपूर्ण जीवन-रण में ‘विजयी भव’ होने का आशीर्वाद देते हुए स्थानीय भाषा में कहती हैं-
“जी रये, जागि रये, तिष्टिये,पनपिये,
दुब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस फइये,।
हिमाल में ह्यूं छन तक,
गंगज्यू में पांणि छन तक,
यो दिन और यो मास भेटनैं रये,
अगासाक चार उकाव,धरती चार चकाव है जये,
स्याव कस बुद्धि हो, स्यू जस पराण हो।”
जी रये, जागि रये, तिष्टिये,पनपिये, - “हरेला तुम्हारे लिए शुभ होवे, तुम जीवन पथ पर विजयी बनो, जागृत बने रहो, समृद्ध बनो, तरक्की करो|
दुब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस फइये -दूब घास की तरह तुम्हारी जड़ सदा हरी रहे, बेर के पेड़ की तरह तुम्हारा परिवार फूले और फले।
हिमाल में ह्यूं छन तक,- जब तक कि हिमालय में बर्फ है,
गंगज्यू में पांणि छन तक - गंगा में पानी है,
यो दिन और यो मास भेटनैं रये- तब तक ये शुभ दिन, मास तुम्हारे जीवन में आते रहें।
अगासाक चार उकाव - आकाश की तरह ऊंचे हो जाओ,
धरती चार चकाव है जये - धरती की तरह चौड़े बन जाओ,
स्याव कस बुद्धि हो - सियार की सी तुम्हारी बुद्धि होवे,
स्यू जस पराण हो - शेर की तरह तुम में प्राणशक्ति हो”
ये ही वे आशीर्वचन और दुआएं हैं जो हरेले के अवसर पर घर के बड़े बूढ़े व बजुर्ग महिलाएं बच्चों, युवाओं और बेटियों के सिर में हरेले की पीली पत्तियों को रखते हुए देती हैं।
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